कठिन है कविता इस समय
कठिन है कविता इस दौर में
जब
शब्दों की सुरक्षा का
कोई ध्यान नहीं है।
जब
सभी के पीछे
अदृश्य आशंका का साया हो,
पहचान छिपा रहें हो
सब अपनी,
अखबार के हाशिए में
जगह बनाने से।
कठिन है यह कहना भी,
दुःख है मुझको।
जब पूछा जाता है
कविता किसके लिए?
मैं सोचता हूँ,
क्या अब भी कोई जगह बची है
जहाँ मनुष्य
सिर्फ मनुष्य की तरह रह सके।
चकाचौंध के रोशनी में
अंधेरे को
बचा पाना कठिन है।
कविता भी कठिन है इस दौर में
धीमे-धीमे
दबाई जा रहीं हैं
आवाज,
जो लगातार
बोलती रहती है
किसी
कवि के भीतर।
- मयंक मिश्र
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