वह.....




वह हँसता था तो लगता था कि प्रकृति ने होंठ बनाये ही

इसलिए कि एक दिन वह मुस्कुरायेगा अपने बचपन में वह सामान्य सा लड़का ही था। पढ़ाई में बेहद औसत जब तक औसत रहा तब तक जिंदगी
एक सुंदर बगीचे मैं उसे झूला झुलाती रही। एक दिन उसकी आँखों की पुतलियाँ निकाल ली गई और उन पुतलियों की जगह सितारे टाँक दिए गए।
वे आँखे शायद फूल टॉकने के लिए बनायी गई थी सितारे नहीं जीवन बीतता रहा। सितारों का नुकीलापन आँखों में गड़ता रहा। वे आँखें जो पत्थर पिघला सकती थी अब एक गहरे घाव के सिवा कुछ भी नहीं घाव में जब कभी धूल जाती तो ऐसा दर्द होता ऐसा दर्द होता कि वह मरने की बातें करता। करीबी लोग उसके मुँह पर उँगली रख देते शब्द उसके शरीर में ही गूंजते रहते।
आँखें बंद करने पर वे शब्द ज़हन में तलवार चलाते चौंक कर उठना उसकी नींद का हिस्सा था। जिन लड़कियों ने उसके साथ रातें बितायी ये चकियाँ देते देते खुद सो गई मगर सितारे रूपी पुतलियों का नाचना नहीं रोक पायी कहते हैं शरीर एक निश्चित तरीके से कार्य करता है मगर उसका शरीर विज्ञान की किताबों को चुनौती देता दिवाली पर उसके कान के ठीक नीचे अनजाने ही बहुत ज़ोर का बम फटा मजाल है कि उसकी पलकें भी झपकी हो आँखो और कानों को जब मालूम होता है कि विस्फोट होने वाला है तो हो सकता है पलके न झपके मगर यूँ अनजाने में विस्फोट होने पर पलकें तो झपकनी चाहिए थी न? घर आकर शीशे में ख़ुद को देखकर वह बहुत हँसा /बहुत रोया। हमेशा एक चिड़चिड़ापन हावी रहता। यह चिड़चिड़ापन लोगों का उसके होंठों पर उँगली रखने के कारण था वह अब अजनबियों से मरने की बातें करने लगा था। अजनबी लोगों के पास होठों पर उँगली रखने का हक नहीं होता। वह धीरे धीरे प्रेत बन गया। उसके तलवों में कीलें उग आयी थी। वह शहरों में भटकने लगा था। पहाड़ और मैदान के बीच वह नदी हो जाना चाहता था मगर वह एक गंदे नाले के सिवा कुछ नहीं बन पाया। मैदान और पहाड़ कहीं भी लोग नाला नहीं देखना चाहते। जिस अजमेर शहर को वह कभी अपना घर कहता था वो अजमेर शहर उसके साथ मुसाफ़िरों की तरह बर्ताव करने लगा। आप सोच रहे होंगे की यह कहानी क्यूँ लिखी जा रही है?

कहानी का अंत क्या होगा? ये मुझे भी नही पता... पता है सिर्फ़ इतना कि "मैं आंखों से चीखता हूं"

क्योंकि

मैं मंटो, कमलेश्वर और स्वदेश दीपक के राख से उपजा हूं!

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