साहित्य का introvert छात्र

साहित्य का इंट्रोवर्ट विद्यार्थी

सबसे पहले introvert का हिन्दी अर्थ अंतर्मुखी होता है और जब साहित्य का विद्यार्थी,साहित्य के अंतर्मुखी चेतना के प्रभाव में आता है तो बच्चन साहब की तरह भूल जाता है कि "क्या भूलूं क्या याद करूं" अभी इन्हीं सब में उलझा रहता की संजीव जी मांडू को लेकर जाते वो देख नहीं पाता...मांडू को न देख पाने से उसका व्याकुल मन आलोक धन्वा के पंक्तियों को याद करता है कि "एक बार और मिलने के बाद भी एक बार और मिलने की इच्छा को वो खत्म नहीं कर पाया" तब सामने से आती सुन्दर स्त्री को देख वो दुष्यंत कुमार बन जाता है और रेल सी गुजरती स्त्री को देख पुल सा थरथरा जाता है! अब ये साहित्य का विद्यार्थी स्त्री को देख ऐसी स्थिति में पहुंच जाता जहां ग़ालिब की दुनिया होती और उस दुनिया से पूछता कि "कोई बताओ की हम बतलायें क्या?" राष्ट्र के नाम पर चुनाव हो रहे इस देश में भी कमलेश्वर का साथ देता है और अंत तक नहीं जान पाता कितने पाकिस्तान है! फिर किसी तरह निराला जी की तरह बोलने की कोशिश करता कि " दुःख ही जीवन की कथा रहीं,क्या कहूँ आज जो नहीं कही!" बहुत दूर कहीं बैठी नयी वाली हिन्दी के तरफ कूच करता ही की मानव कौल मिल जाते हैं, वो बताते कि बहुत दूर कितना दूर होता,किसी को पता नहीं! फिर विद्यार्थी भाग के पुराने अपने गांव,नदी,पहाड़ के साहित्य में जाता और जिनको कोई नहीं जान पाता वो अज्ञेय मिलते तो उनसे पूछ लेता कि "प्लीज़ बताओं और कितनी नावों में जाना पड़ेगा!"इन्हीं सब बातों के मध्य उसे अपनी प्रेमिका याद आती और वो अंतर्मुखी घनानंद की तरह सोचता रहता कि उसने अपने सुजान के समक्ष कभी प्रेमाभिव्यक्ति नहीं कर पाया!
साहित्य को याद करते हुए एक अंतर्मुखी विद्यार्थी का जीवन!

~ मयंक 

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